बुद्ध - तुम केवल एक प्रतिमा हो,

नई दिल्ली से न्यू यॉर्क तक फैले 

रईसों, अमीरों और तथाकथित 

बुद्धिजीवियों के ड्राइंग रूम में

रखी - मात्र - एक प्रतिमा 

तुम वहां सजे हो उन्हें 

एक स्टेटस देने के लिए 

एक झूटी पहचान 

एक मुखौटा देने के लिए 


और तुम्हारी प्रस्तर मूर्ति 

के समक्ष ही सब 

घृणास्पद व्यापार होते है 

बेझिझक, बेहिसाब 


इस विश्व की, और

इसके हर मनुष्य की 

बेशर्मी से, बेहयाई से  

नंगी खरीद फरोख्त 

क्योंकि अब किसको याद है 

तुम्हारा वो त्याग,

स्वयं से संघर्ष 

समाज से सवाल?

अब तो बुद्ध - तुम सिर्फ एक प्रतिमा हो 

~ नीरज गर्ग    

   २४/२५-११-२०१५ 

   फरीदाबाद 

Whenever, I saw any idol, painting, carving, lamp etc. shaped as Buddha bust, these lines always used to come to my mind. These lines were heavily and totally motivated by a very famous poem by Dr.Harivansh Rai Bachchan named Buddha aur Naachghar (Buddha & dancing hall). I am also quoting the said poem of Dr. Bachchan for ready reference and mark of my respect to the bevered poet with due acknowledgement. The complete poem is a bit longer but I am just reproducing the part here which inspired me to write above lines.

 

बुद्ध थे मूर्ति के खिलाफ,

इंसान ने उन्ही की बनायीं मूर्ति 

वे थे पूजा के विरुद्ध, 

इसने उन्ही को दिया पूज,

उन्हें ईश्वर में था अविश्वास, 

इसने उन्ही को कह दिया भगवान 

वे आये थे फैलाने को वैराग्य, 

मिटाने को सिंगार पटार 

इसने उन्ही को बना दिया श्रृंगार 

बनाया उनका सुन्दर आकार 

उनका बेल-मुण्ड था शीश 

इसने लगाये बाल घूंघरदार 

और मिट्टी, लकड़ी, पत्थर, लोहा 

ताम्बा, पीतल, चांदी, सोना 

मूंगा, नीलम, पन्ना, हाथीदांत 

सबके अंदर उन्हें डाल,

तराश, खराद, निकाल 

बना दिया उन्हें बाजार में 

बिकने का सामान 

 

पेकिंग से शिकागो तक 

कोई नहीं क्युरिओ की दूकान 

जहाँ भले ही और न हो कुछ 

बुद्ध की मूर्ति न मिले 

जो मांगो !!

 

बुद्ध भगवान

अमीरों के ड्राइंग रूम 

रईसों के मकान 

तुम्हारे चित्र, तुम्हारी मूर्ति

से शोभायमान 

पर वे हैं

तुम्हारे दर्शन से अनभिज्ञ 

तुम्हारे विचारों से अनजान 

सपने में भी उन्हें 

इसका नहीं आता ध्यान 

शेर की खाल,

हिरन की सींग 

कला-कारीगरी के नमूनों के साथ 

तुम भी हो आसीन 

लोगों की सौंदर्यप्रियता को 

देते हुए तस्कीन 

इसीलिए एक की थी 

तुमने आसमान जमीन?

  

~ श्री हरिवंश राय बच्चन