एक चेष्टा और

कितने बरस
कोशिश की सावधानी से चलने की
कदम यूं फूंक-फूंक कर रखता रहा
फिर भी जाने कितनी ठोकरें,
जाने कितने धक्के खाता रहा
जीवन की इस लम्बी राह पर

कोई राह सहल न रही
कोई मंजिल सहज न मिली।

अब सोचता हूं एक चेष्टा और कर देखूँ
इस बार इस राह पर
मस्ती में - मदहोशी में चलकर देखूँ
क्या मालूम मदहोशी के आलम मे
बिना लड़खडाये, बिना ठोकर खाये
                    -- तुम तक पहुँच पांऊ।

 

~ नीरज गर्ग

  ०९.०६.२०१५